Wednesday, March 13, 2013

 विज्ञापन का मायाजाल और आम आदमी


आजकल अक्सर लोग कहते हैं, चारों ओर बाज़ार पसरा है, विज्ञापन आकृष्ठ करते हैं, बच्चे मंहगे मंहगे सामान ख़रीदने की ज़िद करते हैं। आवश्यकता न होने पर भी लोग फ़ालतू सामान ख़रीद लेते हैं। कभी लोग पुराने वख्त को  याद करने लगते हैं जब बाज़ार और मीडिया की पंहुच आम आदमी तक नहीं थी।
संतोष एक निजी गुण है, यदि संतोष आवश्यकता से अधिक बढ जाय तो व्यक्ति को अकर्मण्य sबना देता है। व्यक्ति  न अपने लियें कुछ करना चाहता है न परिवार के लियें न ही समाज के लियें। संतोष हो ही नहीं और जीवन मे बहुत जल्दी जल्दी बहुत कुछ पाने की या हासिल करने की इच्छा बलवती हो जाय तो व्यक्ति भ्रष्टचार या अपराध की तरफ़ मुड़ सकता है।
जब आर्थिक उन्नति होती है तो उत्पादन बढता है, यह निश्चय ही विकास का संकेत है। उत्पादन बढने से अधिक लोगों को रोज़गार मिलता है, उनकी ख़रीदने की क्षमता बढती है। जब बाज़ार मे  तरह तरह के उत्पाद हैं तो बिकने भी चाहियें। जब पहले उत्पादन कम था, ख़रीदने के लियें विकल्प भी कम थे  इसलियें विज्ञापन की आवश्यकता भी कम थी। विज्ञापन देने के माध्यम भी कम थे, पर विज्ञापन कोई नई चीज़ भी नहीं है,  इससे बाज़ार मे उपलब्ध सामान की जानकारी उपभोक्ता को मिलती है। पहले जब हर छोटी बडी़ चीज़ की बुकिंग करानी पड़ती थी, राशन मे सामान मिलता था, एक फ़ोन लगवाने के लियें महीनों प्रतीक्षा करनी पड़ती थी, तब विज्ञापनों का विस्तार और महत्व आज के मुक़ाबले काफ़ी कम था।  जब बाज़ार मे तरह तरह के उत्पाद मौजूद हैं, कड़ी प्रतियोगिता के बीच अपने उत्पाद को बेचना कोई आसान काम नहीं है।  हर उत्पादन को बेचने के लियें विज्ञापन प्रचार का माध्यम होता है। विज्ञापनो के सौजन्य से ही हम समाचारपत्र और पत्रिकायें इतने कम पैसों मे पढ़ पाते हैं टी.वी. और रडियो के इतने सार चैनल भी विज्ञापनो से प्राप्त धनराशि के द्वारा ही हम तक पहुँते है, विज्ञापन व्यवसाय जगत का एक  अहम हिस्सा हैं।  विज्ञापनदाताओं के लियें भी एक आचार संहिता का पालन करना आवश्यक होता है ,   जैसे अपने माल की तरीफ़ मे अतिशयोक्ति न करें, विज्ञापन अश्लील न हों या वो किसी की भावनाओं को ठेस न पंहुचायें आदि।  विज्ञापन जगत भी बहुत सारे लोंगों को रोज़गार देने का ज़रिया भी है , इसलियें विज्ञापन के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। विज्ञापनदाता और उत्पादकों का तो उद्देश्य ही यही  होता है कि उनके विज्ञापन पर अधिक से अधिक लोगों की नज़र पड़े,  उनके उत्पाद को ख़रीदने की इच्छा जगाई जाय। ये लोग बस अपना काम करते हैं और कुछ नहीं। क्या ख़रीदना है क्या नहीं इसकी ज़िम्मेदारी तो अंत मे उपभोक्ता की ही होती है।
आर्थिक उन्नति के साथ बहुत से लोग काफ़ी धनी हो गये है,ये लोग अगर खुलकर ख़र्च करते हैं तो वो पैसा किसी न किसी रूप मे किसी के रोज़गार देन का माध्यम बनता है। बस इसका एक ही पक्ष ग़लत है कि देखा देखी करके वे लोग भी जिनकी क्षमता उतना ख़र्च करने की नहीं है इस प्रकार के सपने पाल लेते हैं। कभी कभी इन  सपनों को पूरा करने के लियें अपराध की ओर मुड़ जाते हैं या हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं,जो कदापि  सही नहीं है, परन्तु इसके लियें विज्ञापन जगत को दोष देना भी उचित नहीं है। उपभोक्ता को भी अपने लियें ख़ुद ही एक आचार संहिता बना कर उसका पालन करना चाहिये। सबसे पहले  प्राथमिक आवश्यकतायें पूरी करना ज़रूरी है, उसके बाद धीरे धीरे अन्य सुविधाये जुटानी चाहियें। उपभोक्ता को    सजग रहना चाहिये,     किसी विज्ञापन से आकृष्ठ होकर क्षणिक उन्माद मे कोई बड़ा ख़र्चा नहीं करना चाहिये ,अपनी  ग़लत ख़रीदारी का दोष विज्ञापन को देने से तो कोई फ़यदा होने से रहा अपनी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के बाद कुछ धन सुरक्षित भविष्य के लियें निवेष करना भी ज़रूरी है, इन चीज़ो का एक मोटा सा प्रारूप दिमाग़ मे होना चाहिये। इसके बाद जो धन आपके पास अपल्ब्ध हो उसे अपने शौक पूरे करने के लियें प्रयोग किया जा  सकता है। जब कोई बड़ी चीज़ ख़रीदने का मन बन जाय तब बाज़ार मे उपलब्ध सामान और विज्ञापनों का आँकलन करके ख़रीदना ही उचित होता है।
आजकल हर व्स्तु मासिक किश्तो पर उपल्ब्ध होती है, कभी कोई एक चीज़ किश्तों पर ले ली जाय तो कोई बात नहीं पर कई चीज़े मासिक किश्तों मे लेने से हो सकता है प्राथमिक आवश्यकतायें पूरी करने मे या कोई आकस्मिक ज़रूरत आने पर कठिनाई का सामना करना पड़े।जिन लोगों के पास अपार धन सम्पति है उन्हे इतना विचार करने की ज़रूरत नहीं है पर आम आदमी के लियें  बिना विचार के विज्ञापन से बहकना भारी पड़ सकता है। पहले भी अमीर भी थे और ग़रीब थे पर बा़ज़ार की चमक दमक इतनी नहीं थी , इसलिये लोग किसी वस्तु के आकर्षण मे इतनी जल्दी नहीं पड़ते थे। ग़रीबी और अमीरी दुनिया मे सब जगह है ,ये बात अलग है कि विकसित देशों के ग़रीब विकासशील देशों जितने ग़रीब नहीं हैं। आर्थिक असमानता को तो कोई कम्यूनिस्ट देश भी नहीं रोक पाया, इसलिये अपनी चादर देखकर पाँव पसारने वाला मुहावरा हर स्थिति मे सही बैठता है।
आजकल तकनीकी और इलैक्ट्रौनिक्स के क्षेत्र मे रोज़ नये नये उत्पाद बहुत ज़ोर शोर के साथ बाज़ार मे उतारे जाते हैं। दिखावे के लियें ये सब इतनी जल्दी जल्दी बदलना भी ज़रूरी नहीं है ,क्योकि नये गैजेट के सारे फंक्शन  शायद हरेक के लियें उपयोगी भी न हों। यदि आपका लैपटौप ठीक काम कर रहा है या मोबाइल भी ठीक ठाक है तो किसी नये माडल से आकर्षित हो कर उसे बदलना भी ठीक नहीं होगा। माता पिता सोच समझ कर ख़रीददारी करते हैं तो संभावना यही है कि बच्चे भी फ़िज़ूल की ज़िद नहीं करेंगे। बच्चे कुछ माँग करें तो उन्हे सोच समझकर ही पूरा करना उचित है बच्चों को कुछ पौकेट मनी तो दी ही जाती है जब वे कुछ अच्छा काम करें तो उनको नक़द इनाम दे सकते हैं, जिससे वे समझदारी के साथ अपने शौक पूरा करना सीख जायेंगे। उन्हे दूसरों की चीज़ो से आकर्षित हो कर ख़रीदने की आदत को बढावा कभी नहीं देना चाहिये।
सबसे अहम बात यह है कि कोई चीज़ तब तक ही आपको आकर्षित करती है जब तक वह आपके पास नहीं होती, जब वह आपकी हो जाती है वह अपना आकर्षण खो देती है , किसी और चीज़ की तरफ़ आप आकर्षित हो जाते हैं।  ज़रा सोच कर देखिये पिछली बार जब आपने कोई बहुत मंहगी चीज़ खरीदी थी उसकी वजह से आप कितने दिन तक ख़ुश रहे थे ?  

2 comments:

  1. बहुत बढ़िया लिखा भाई साहब आपने कुछ मीडिया के इवैंट मेनेजमेंट पर भी बताने की कृपा करें। धन्यवाद

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    1. जरूर शाकुंत भाई

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